यह कहानी शुरू होती है धमतरी से – छत्तीसगढ़ का एक छोटा-सा शहर, जिसे आप किसी मशहूर नक्शे पर ढूँढ़ेंगे तो शायद न मिले।
लेकिन यहाँ, शिव सिंह वर्मा आदर्श शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय के अंदर, कुछ बड़ा हो रहा है।
एक छोटा-सा कमरा – जहाँ रखे हैं सोल्डरिंग आयरन, 3D प्रिंटर, आधी बनी रोबोटिक गाड़ियाँ, और उनके बीच बैठे कुछ ऐसे बच्चे, जिन्होंने तय कर लिया है कि “छोटे शहर” का मतलब “छोटे सपने” नहीं होता।

उस कमरे का नाम है – अटल टिंकरिंग लैब।
सिर्फ एक लैब नहीं, एक उम्मीद
अगर आप वहाँ जाएँ, तो देखेंगे – कोई सर्किट बोर्ड पर झुका है, कोई लैपटॉप पर कोडिंग कर रहा है, कोई कागज़ पर कोई समस्या का हल बना रहा है।
जैसे –
- टचलेस टेम्पल बेल प्रोजेक्ट
- गाँव की सड़कों पर खुले में घूमते पशुओं से बचाव का सेंसर।
- या फिर किसानों के लिए सस्ता नमी (मॉइस्चर) सेंसर।
ये बच्चे कॉलेज का इंतज़ार नहीं कर रहे। वो अभी से बना रहे हैं।
यह लैब अटल इनोवेशन मिशन (नीति आयोग) के तहत चलती है। मतलब – सिर्फ गैजेट्स बनाना नहीं, बल्कि अपने आस-पास की असली समस्याओं के लिए असली जवाब ढूँढ़ना।

क्लास से दिल्ली तक का सफर
पिछले कुछ सालों में इन बच्चों ने चुपचाप (और कभी-कभा बहुत शोर मचाते हुए) राज्य और राष्ट्रीय स्तर की कई प्रतियोगिताएँ जीती हैं।
नहीं, उनके पास महँगे संसाधन नहीं हैं। लेकिन उनके पास है – जिज्ञासा, और असफल होने का ज़बरदस्त हौसला।
एक बच्चे ने मुझसे कहा था:
“हम बस कुछ ऐसा बनाना चाहते थे जो किसी के काम आए। लैब ने हमें वो मौका दिया।”
और यही तो टिंकरिंग है – पहली बार में सही करने का नाम नहीं, बल्कि दसवीं या बीसवीं बार में भी न हारने का नाम।
लेकिन असली गर्व का लम्हा तब आया, जब…निति आयोग द्वारा आयोजित कम्पटीशन में सिलेक्शन के पश्चात्
इन बच्चों को गणतंत्र दिवस परेड के लिए दिल्ली बुलाया गया।
खास मेहमान के तौर पर।

धमतरी के एक सरकारी स्कूल के बच्चे, दिल्ली में कर्तव्य पथ पर, गणतंत्र दिवस पर। और वो भी मेहमान की तरह। पूरे शहर को गर्व महसूस हुआ।
एक बच्चे ने कहा –
“हमें बहुत गर्व है। अब और मेहनत करेंगे, और बड़े सपने देखेंगे।”

यह अकेले नहीं हुआ
जब आप कोई प्रोटोटाइप बनाते हैं, तो उसके पीछे कोई मेंटर होता है जो स्कूल खत्म होने के बाद भी रुकता है।
जब आप कोई प्रतियोगिता जीतते हैं, तो उसके पीछे कोई होता है जिसने आप पर भरोसा किया, तब भी जब आपने खुद पर नहीं किया था।
तो सबसे पहले शुक्रिया – अटल इनोवेशन मिशन का।
अगर ये लैब नहीं होती, तो यह कमरा आज भी एक साधारण क्लासरूम होता।
और खास तौर पर शुक्रिया – टेक बी भिलाई (TECHB Bhilai) का।
ये हमारे टेक्निकल पार्टनर हैं। और वो सिर्फ एक बार आकर चले जाने वाले लोग नहीं थे।
वो बार-बार आए। ट्रेनिंग दी। बच्चों की हर छोटी-बड़ी गलती को धैर्य से सुना। हर टूटी मोटर, हर अटकी कोडिंग में हाथ बँटाया।
इस तरह का साथ सब कुछ बदल देता है।

असली मतलब क्या है?
देखिए, इस लैब का हर बच्चा इंजीनियर या स्टार्टअप वाला नहीं बनेगा। और इसमें कोई बुराई नहीं है।
लेकिन हर एक बच्चा स्कूल से कुछ बहुत कीमती लेकर जाएगा –
वो भरोसा कि वे किसी समस्या को पहचान सकते हैं, उसका हल ढूँढ़ सकते हैं, और किसी बड़े मंच पर खड़े होकर कह सकते हैं – “यह मैंने बनाया है।”
एक छोटी सी टिंकरिंग लैब से धमतरी, और धमतरी से दिल्ली के कर्तव्य पथ तक –
ये बच्चे पहले ही उतना सफर तय कर चुके हैं, जितना बहुत लोग सपने में भी नहीं करते।
और सबसे अच्छी बात..
ये अभी रुके नहीं हैं।
गर्व है हमारे युवा इनोवेटर्स पर।
और गर्व है उस स्कूल, उस शहर, और उन सब हाथों पर जिन्होंने इन सपनों को पंख दिए।
यह कहानी शुरू होती है धमतरी से – छत्तीसगढ़ का एक छोटा-सा शहर, जिसे आप किसी मशहूर नक्शे पर ढूँढ़ेंगे तो शायद न मिले।
लेकिन यहाँ, शिव सिंह वर्मा आदर्श शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय के अंदर, कुछ बड़ा हो रहा है।
एक छोटा-सा कमरा – जहाँ रखे हैं सोल्डरिंग आयरन, 3D प्रिंटर, आधी बनी रोबोटिक गाड़ियाँ, और उनके बीच बैठे कुछ ऐसे बच्चे, जिन्होंने तय कर लिया है कि “छोटे शहर” का मतलब “छोटे सपने” नहीं होता।

उस कमरे का नाम है – अटल टिंकरिंग लैब।
सिर्फ एक लैब नहीं, एक उम्मीद
अगर आप वहाँ जाएँ, तो देखेंगे – कोई सर्किट बोर्ड पर झुका है, कोई लैपटॉप पर कोडिंग कर रहा है, कोई कागज़ पर कोई समस्या का हल बना रहा है।
जैसे –
- टचलेस टेम्पल बेल प्रोजेक्ट
- गाँव की सड़कों पर खुले में घूमते पशुओं से बचाव का सेंसर।
- या फिर किसानों के लिए सस्ता नमी (मॉइस्चर) सेंसर।
ये बच्चे कॉलेज का इंतज़ार नहीं कर रहे। वो अभी से बना रहे हैं।
यह लैब अटल इनोवेशन मिशन (नीति आयोग) के तहत चलती है। मतलब – सिर्फ गैजेट्स बनाना नहीं, बल्कि अपने आस-पास की असली समस्याओं के लिए असली जवाब ढूँढ़ना।

क्लास से दिल्ली तक का सफर
पिछले कुछ सालों में इन बच्चों ने चुपचाप (और कभी-कभा बहुत शोर मचाते हुए) राज्य और राष्ट्रीय स्तर की कई प्रतियोगिताएँ जीती हैं।
नहीं, उनके पास महँगे संसाधन नहीं हैं। लेकिन उनके पास है – जिज्ञासा, और असफल होने का ज़बरदस्त हौसला।
एक बच्चे ने मुझसे कहा था:
“हम बस कुछ ऐसा बनाना चाहते थे जो किसी के काम आए। लैब ने हमें वो मौका दिया।”
और यही तो टिंकरिंग है – पहली बार में सही करने का नाम नहीं, बल्कि दसवीं या बीसवीं बार में भी न हारने का नाम।
लेकिन असली गर्व का लम्हा तब आया, जब…निति आयोग द्वारा आयोजित कम्पटीशन में सिलेक्शन के पश्चात्
इन बच्चों को गणतंत्र दिवस परेड के लिए दिल्ली बुलाया गया।
खास मेहमान के तौर पर।

धमतरी के एक सरकारी स्कूल के बच्चे, दिल्ली में कर्तव्य पथ पर, गणतंत्र दिवस पर। और वो भी मेहमान की तरह। पूरे शहर को गर्व महसूस हुआ।
एक बच्चे ने कहा –
“हमें बहुत गर्व है। अब और मेहनत करेंगे, और बड़े सपने देखेंगे।”

यह अकेले नहीं हुआ
जब आप कोई प्रोटोटाइप बनाते हैं, तो उसके पीछे कोई मेंटर होता है जो स्कूल खत्म होने के बाद भी रुकता है।
जब आप कोई प्रतियोगिता जीतते हैं, तो उसके पीछे कोई होता है जिसने आप पर भरोसा किया, तब भी जब आपने खुद पर नहीं किया था।
तो सबसे पहले शुक्रिया – अटल इनोवेशन मिशन का।
अगर ये लैब नहीं होती, तो यह कमरा आज भी एक साधारण क्लासरूम होता।
और खास तौर पर शुक्रिया – टेक बी भिलाई (TECHB Bhilai) का।
ये हमारे टेक्निकल पार्टनर हैं। और वो सिर्फ एक बार आकर चले जाने वाले लोग नहीं थे।
वो बार-बार आए। ट्रेनिंग दी। बच्चों की हर छोटी-बड़ी गलती को धैर्य से सुना। हर टूटी मोटर, हर अटकी कोडिंग में हाथ बँटाया।
इस तरह का साथ सब कुछ बदल देता है।

असली मतलब क्या है?
देखिए, इस लैब का हर बच्चा इंजीनियर या स्टार्टअप वाला नहीं बनेगा। और इसमें कोई बुराई नहीं है।
लेकिन हर एक बच्चा स्कूल से कुछ बहुत कीमती लेकर जाएगा –
वो भरोसा कि वे किसी समस्या को पहचान सकते हैं, उसका हल ढूँढ़ सकते हैं, और किसी बड़े मंच पर खड़े होकर कह सकते हैं – “यह मैंने बनाया है।”
एक छोटी सी टिंकरिंग लैब से धमतरी, और धमतरी से दिल्ली के कर्तव्य पथ तक –
ये बच्चे पहले ही उतना सफर तय कर चुके हैं, जितना बहुत लोग सपने में भी नहीं करते।
और सबसे अच्छी बात..
ये अभी रुके नहीं हैं।
गर्व है हमारे युवा इनोवेटर्स पर।
और गर्व है उस स्कूल, उस शहर, और उन सब हाथों पर जिन्होंने इन सपनों को पंख दिए।
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