‎दुर्ग की यह लड़की इसरो के श्रीहरिकोटा गई और सिर्फ सर्टिफिकेट से कहीं अधिक लेकर लौटी

news May 31, 2026
Tech Warmup By Tech Warmup

कुछ खबरें ऐसी होती हैं कि बस एक कप चाय छोड़कर बैठ जाइए और लिखते जाइए। ये उन्हीं में से एक है।अमीषा निषाद। नाम तो छोटा सा है, लेकिन सपना बड़ा।
सैजस जामगाँव आर की इस छात्रा ने न तो किसी कोचिंग का चक्कर लगाया, न कोई शॉर्टकट ढूंढ़ा। बस पढ़ाई की, सवाल पूछे, और लगे रही। और फिर एक दिन इसरो ने दरवाज़ा खटखटाया।


छत्तीसगढ़ से सिर्फ 13, दुर्ग से सिर्फ एक

इसरो हर साल युविका 2026-27 प्रोग्राम चलाता है – युवा वैज्ञानिकों के लिए एक रेजिडेंशियल ट्रेनिंग कैंप।
देशभर से आवेदन आए। चयन बहुत कठिन था।

पूरे छत्तीसगढ़ से सिर्फ 13 विद्यार्थियों का चयन हुआ।
और दुर्ग जिले से?
बस एक नाम – अमीबा निषाद

पिता उमेश कुमार निषाद। गाँव – बेल्हारी, पाटन ब्लॉक।
उस गाँव की बेटी ने पूरे जिले का नाम रोशन कर दिया।


श्रीहरिकोटा में 10 दिन, और एक यादगार मुलाकात

दस दिनों के लिए अमीबा ने सतीश धवन स्पेस सेंटर, श्रीहरिकोटा (आंध्र प्रदेश) में दम लगाया।
यह वही जगह है जहाँ से भारत अपने रॉकेट लॉन्च करता है। जरा सोचिए।

वहाँ उन्होंने सिर्छ सुना नहीं – बल्कि वैज्ञानिकों के साथ मिलकर काम किया।
प्रोजेक्ट बनाए। प्रैक्टिकल समझे। पता चला कि किताबों के बाहर असली विज्ञान कैसे काम करता है।

और सबसे बड़ी बात – गगनयात्री शुभांशु शुक्ला से बात की
जी हाँ, वही शुभांशु शुक्ला जो अंतरिक्ष जाने की ट्रेनिंग ले रहे हैं।
अमीबा ने उनसे सवाल पूछे। उन्होंने जवाब दिए।
यह अनुभव किताबों से नहीं मिलता।

वह 25 मई को लौटीं।
लेकिन खाली हाथ नहीं – हाथों में नोटबुक लेकर, और दिमाग में अरमानों का आसमान लेकर।


कलेक्टर और डीईओ ने खुद किया स्वागत

आमतौर पर ऐसी उपलब्धियों पर फोन आ जाता है, कोई शुभकामना संदेश आ जाता है।
लेकिन दुर्ग के कलेक्टर अभिजीत सिंह और जिला शिक्षा अधिकारी अरविंद मिश्रा कुछ और ही किस्म के लोग निकले।

उन्होंने अमीबा को बुलाया। सम्मान चिन्ह दिया। प्रमाणपत्र दिया। और बैठकर उसकी कहानी सुनी।

इस मौके पर डीपीसी ऋषमनाथ, प्राचार्य कविता साहू, और गाइड टीचर विनीता सुधीर भी मौजूद थीं।

हर किसी ने एक बात कही – विनीता मैडम के मार्गदर्शन की तारीफ।
और सही भी है। अमीबा जैसी स्टूडेंट के पीछे कोई न कोई टीचर होता है, जो बिना थके साथ खड़ा रहता है।


इसरो ने सिर्फ ट्रेनिंग नहीं, एक रास्ता दिया

इसरो ने इन बच्चों को ट्रेनिंग देकर भेजा ही नहीं – साथ में बहुत उपयोगी शैक्षणिक सामग्री भी दी।
वो सामान जो आगे जाकर काम आता है, जो दिशा दिखाता है, जो आपको बताता है – "अब अपने दम पर चलो।"

अमीबा ने खुद कहा – असली प्रोजेक्ट्स और प्रैक्टिकल्स समझने का मौका मिला।
बस रट्टा लगाकर कोई वैज्ञानिक नहीं बनता। इसे अमीबा ने जीकर दिखाया।


असली बात

आपको मुंबई या बैंगलोर रहना ज़रूरी नहीं।
आपको किसी बड़े शहर के स्कूल में पढ़ना ज़रूरी नहीं।

बस चाहिए – एक जिज्ञासा। एक जिद। और एक टीचर जो कहे, "तू कर सकती है।"

अमीबा ने यही करके दिखाया।

पाटन ब्लॉक के बेल्हारी गाँव से लेकर श्रीहरिकोटा के रॉकेट लॉन्चिंग पैड तक – ये सफर छोटा नहीं है।
ये वो सफर है जिसे देखकर दूसरे छोटे शहरों, दूसरे गाँवों के बच्चे कहेंगे –
"अगर वो कर सकती है, तो मैं क्यों नहीं?"

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‎दुर्ग की यह लड़की इसरो के श्रीहरिकोटा गई और सिर्फ सर्टिफिकेट से कहीं अधिक लेकर लौटी

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कुछ खबरें ऐसी होती हैं कि बस एक कप चाय छोड़कर बैठ जाइए और लिखते जाइए। ये उन्हीं में से एक है।अमीषा निषाद। नाम तो छोटा सा है, लेकिन सपना बड़ा।
सैजस जामगाँव आर की इस छात्रा ने न तो किसी कोचिंग का चक्कर लगाया, न कोई शॉर्टकट ढूंढ़ा। बस पढ़ाई की, सवाल पूछे, और लगे रही। और फिर एक दिन इसरो ने दरवाज़ा खटखटाया।


छत्तीसगढ़ से सिर्फ 13, दुर्ग से सिर्फ एक

इसरो हर साल युविका 2026-27 प्रोग्राम चलाता है – युवा वैज्ञानिकों के लिए एक रेजिडेंशियल ट्रेनिंग कैंप।
देशभर से आवेदन आए। चयन बहुत कठिन था।

पूरे छत्तीसगढ़ से सिर्फ 13 विद्यार्थियों का चयन हुआ।
और दुर्ग जिले से?
बस एक नाम – अमीबा निषाद

पिता उमेश कुमार निषाद। गाँव – बेल्हारी, पाटन ब्लॉक।
उस गाँव की बेटी ने पूरे जिले का नाम रोशन कर दिया।


श्रीहरिकोटा में 10 दिन, और एक यादगार मुलाकात

दस दिनों के लिए अमीबा ने सतीश धवन स्पेस सेंटर, श्रीहरिकोटा (आंध्र प्रदेश) में दम लगाया।
यह वही जगह है जहाँ से भारत अपने रॉकेट लॉन्च करता है। जरा सोचिए।

वहाँ उन्होंने सिर्छ सुना नहीं – बल्कि वैज्ञानिकों के साथ मिलकर काम किया।
प्रोजेक्ट बनाए। प्रैक्टिकल समझे। पता चला कि किताबों के बाहर असली विज्ञान कैसे काम करता है।

और सबसे बड़ी बात – गगनयात्री शुभांशु शुक्ला से बात की
जी हाँ, वही शुभांशु शुक्ला जो अंतरिक्ष जाने की ट्रेनिंग ले रहे हैं।
अमीबा ने उनसे सवाल पूछे। उन्होंने जवाब दिए।
यह अनुभव किताबों से नहीं मिलता।

वह 25 मई को लौटीं।
लेकिन खाली हाथ नहीं – हाथों में नोटबुक लेकर, और दिमाग में अरमानों का आसमान लेकर।


कलेक्टर और डीईओ ने खुद किया स्वागत

आमतौर पर ऐसी उपलब्धियों पर फोन आ जाता है, कोई शुभकामना संदेश आ जाता है।
लेकिन दुर्ग के कलेक्टर अभिजीत सिंह और जिला शिक्षा अधिकारी अरविंद मिश्रा कुछ और ही किस्म के लोग निकले।

उन्होंने अमीबा को बुलाया। सम्मान चिन्ह दिया। प्रमाणपत्र दिया। और बैठकर उसकी कहानी सुनी।

इस मौके पर डीपीसी ऋषमनाथ, प्राचार्य कविता साहू, और गाइड टीचर विनीता सुधीर भी मौजूद थीं।

हर किसी ने एक बात कही – विनीता मैडम के मार्गदर्शन की तारीफ।
और सही भी है। अमीबा जैसी स्टूडेंट के पीछे कोई न कोई टीचर होता है, जो बिना थके साथ खड़ा रहता है।


इसरो ने सिर्फ ट्रेनिंग नहीं, एक रास्ता दिया

इसरो ने इन बच्चों को ट्रेनिंग देकर भेजा ही नहीं – साथ में बहुत उपयोगी शैक्षणिक सामग्री भी दी।
वो सामान जो आगे जाकर काम आता है, जो दिशा दिखाता है, जो आपको बताता है – "अब अपने दम पर चलो।"

अमीबा ने खुद कहा – असली प्रोजेक्ट्स और प्रैक्टिकल्स समझने का मौका मिला।
बस रट्टा लगाकर कोई वैज्ञानिक नहीं बनता। इसे अमीबा ने जीकर दिखाया।


असली बात

आपको मुंबई या बैंगलोर रहना ज़रूरी नहीं।
आपको किसी बड़े शहर के स्कूल में पढ़ना ज़रूरी नहीं।

बस चाहिए – एक जिज्ञासा। एक जिद। और एक टीचर जो कहे, "तू कर सकती है।"

अमीबा ने यही करके दिखाया।

पाटन ब्लॉक के बेल्हारी गाँव से लेकर श्रीहरिकोटा के रॉकेट लॉन्चिंग पैड तक – ये सफर छोटा नहीं है।
ये वो सफर है जिसे देखकर दूसरे छोटे शहरों, दूसरे गाँवों के बच्चे कहेंगे –
"अगर वो कर सकती है, तो मैं क्यों नहीं?"

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